ईरान में सैन्य हस्तक्षेप: वियतनाम की त्रासदी दोहराने का खतरा 1968 में दक्षिण वियतनाम में तैनात 5.5 लाख सैनिक और 4,000 से अधिक युद्धक विमान थे। उड़ान भरने से लेकर लक्ष्य तक पहुंचने में मात्र दस मिनट का समय था। फिर भी, इस विशाल सैन्य शक्ति के बावजूद, संयुक्त राज्य अमेरिका को वियतनाम युद्ध में विफलता का सामना करना पड़ा। इस संघर्ष में 20 लाख वियतनामी और 58,000 अमेरिकी सैनिकों की जान चली गई। यह ऐतिहासिक तथ्य आज के भू-राजनीतिक संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ विश्लेषक ईरान पर सैन्य आक्रमण की बात करते हैं। वियतनाम के अनुभव से स्पष्ट संदेश यह है कि सर्वश्रेष्ठ सैन्य उपकरण और अधिकतम सैनिक संख्या किसी युद्ध में विजय का गारंटी नहीं दे सकती। ईरान की भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या और सांस्कृतिक विविधता वियतनाम जितनी ही जटिल है। ईरान का क्षेत्रफल 16.4 लाख वर्ग किलोमीटर है और वहां 88 मिलियन से अधिक लोग रहते हैं। देश के पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में छापामार युद्ध संभव है। यदि किसी विदेशी शक्ति ने ईरान पर आक्रमण किया, तो वहां की जनता राष्ट्रीय गौरव की रक्षा के लिए एकजुट हो सकती है। वियतनाम में अमेरिकी असफलता के प्रमुख कारण स्थानीय जनता का समर्थन न मिलना था। लंबे समय तक विदेशी सैन्य मौजूदगी से स्थानीय आबादी में असंतोष पैदा हुआ। ईरान के संदर्भ में भी यही स्थिति हो सकती है। किसी भी आक्रमण के बाद, ईरानी जनता विरोध आंदोलन में शामिल हो सकती है, जिससे दीर्घकालिक व्यस्तता और मानवीय क्षति बढ़ेगी। आधुनिक युद्ध केवल सैन्य शक्ति के बारे में नहीं है। राजनीतिक स्थिरता, अंतर्राष्ट्रीय समर्थन, आर्थिक संसाधन और जनता की सहमति समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। वियतनाम में अमेरिकी सरकार को घरेलू राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा। ईरान में भी समान परिस्थितियां बन सकती हैं। वर्तमान समय में मध्य पूर्व क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। ईरान का क्षेत्रीय महत्व, इसके तेल भंडार, और अन्य देशों के साथ जटिल संबंध किसी भी सैन्य हस्तक्षेप को विश्वव्यापी संकट में बदल सकते हैं। विशेषज्ञ और इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि सैन्य समाधान केवल अल्पकालिक लाभ दे सकता है। दीर्घकालिक शांति और स्थिरता के लिए कूटनीति, बातचीत और राजनीतिक समझौते आवश्यक हैं। वियतनाम की विफलता से यही सबक मिलता है। निष्कर्ष यह है कि ईरान पर किसी भी सैन्य आक्रमण की योजना बनाने से पहले, विश्व को वियतनाम जैसे युद्धों के गंभीर परिणामों को याद रखना चाहिए। सशस्त्र संघर्ष से बचना और कूटनीतिक माध्यमों को प्राथमिकता देना ही बुद्धिमानी है। Post navigation रूसी शासक दल के प्रतिनिधिमंडल की भाजपा नेतृत्व से मुलाकात मेघालय का नाम बदलने की मांग, AAYF ने दिया प्रतिनिधित्व